Saturday, 31 December 2016

ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

रोते रोते हसना सिख रहा हू
लोगो के चेहरे पढ़ना सिख रहा हू
थोड़ा वक़्त तो ज़रूर लगेगा यार
क्यू की मैं ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

सिख रहा हू पंचियो से उड़ना
और बाद्लोसे घूमना
सिख रहा हू मौसमो से बदलना
और नदियो से दौड़ ना
सिख रहा हू तारो से चमकना
और रातो से गुज़रना
सबर रखना मेरे यार
क्यू की मैं ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

दिल की बात बोलना सिख रहा हू
और मन की आवाज़ को भी सुनना सिख रहा हू
बीते हुए कल से सीखा भुलाना
और आने वाले कल से सीखा गुमनाम रहना
घड़ी के काटो से बंधना सिख रहा हू
थोड़ा समय तो दे मेरे यार
क्यू की मैं ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

बीना बिस्तर के ही सोना सिख रहा हू
ख्वाबो को हक़ीक़त मे बदलना सिख रहा हू
चलते चलते गिरना सिख रहा हू
और फिर गिरकर उठना सिख रहा हू
रास्ते पर काँटों को भी अपनाना सिख रहा हू
थोड़ा वक़्त तो लगेगा यार
क्यू की मैं ज़िंदगी को जीना सिख रहा हू

-किरण

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